Bihar Board Class 11th Geography Chapter 3 Notes: पृथ्वी की आंतरिक संरचना (Interior of the Earth)
यह लेख बिहार बोर्ड (BSEB) कक्षा 11 के भूगोल (Geography) विषय के अध्याय 3 "पृथ्वी की आंतरिक संरचना" (Interior of the Earth) का एक संपूर्ण और मास्टर स्टडी गाइड है। इस नोट्स में पृथ्वी के अंदर की परतों (भूपर्पटी, मेंटल और क्रोड) का वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। साथ ही पृथ्वी की आंतरिक जानकारी देने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों, भूकंप (Earthquake), P, S और L भूकंपीय तरंगों, छाया क्षेत्र (Shadow Zone), और ज्वालामुखी (Volcanoes) के विभिन्न प्रकारों व उनसे बनने वाली आकृतियों को बहुत ही सरल भाषा में समझाया गया है। बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए इसमें अति-महत्वपूर्ण (VVI) प्रश्नोत्तर भी शामिल हैं।
"एक अल्ट्रा-रियलिस्टिक (Ultra-realistic) 3D क्रॉस-सेक्शन कट-आउट इमेज जिसमें पृथ्वी की आंतरिक परतें साफ दिखाई दे रही हों। सबसे बाहरी परत (Crust) पर पहाड़, महासागर और हरियाली हो। उसके नीचे का हिस्सा (Mantle) लाल और नारंगी रंग के पिघले हुए मैग्मा जैसा हो, और पृथ्वी का बिल्कुल केंद्र (Core) अत्यधिक चमकीला और पीले-सफेद रंग का ठोस गोला हो। साथ ही ग्राफ़िक्स के रूप में भूकंपीय तरंगों (Seismic waves) का प्रभाव भी दर्शाया गया हो। 8K रेजोल्यूशन, सिनेमैटिक लाइटिंग, बिना किसी टेक्स्ट या वाटरमार्क के।"
1. प्रस्तावना (Introduction)
हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं, उसकी बाहरी सतह के बारे में तो हमें बहुत कुछ पता है, लेकिन पृथ्वी के अंदर क्या है? यह जानना हमेशा से मानव के लिए एक चुनौती रहा है। पृथ्वी की त्रिज्या (Radius) 6,370 किलोमीटर है। कोई भी इंसान पृथ्वी के केंद्र तक नहीं पहुँच सकता क्योंकि जैसे-जैसे हम गहराई में जाते हैं, तापमान और दबाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि कोई भी वस्तु पिघल जाएगी।
अब तक का सबसे गहरा ड्रिलिंग (छेद) आर्कटिक महासागर के कोला प्रायद्वीप (Kola Peninsula) में किया गया है, जो केवल 12 किलोमीटर गहरा है। तो फिर वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के अंदर की बनावट का पता कैसे लगाया? इसके लिए भूगोलवेत्ताओं ने कुछ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्रोतों का सहारा लिया है।
2. पृथ्वी की आंतरिक जानकारी के स्रोत (Sources of Information)
पृथ्वी के अंदर की जानकारी प्राप्त करने के साधनों को दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है:
(A) प्रत्यक्ष स्रोत (Direct Sources)
ये वे स्रोत हैं जिन्हें हम सीधे तौर पर देख या भौतिक रूप से महसूस कर सकते हैं:
- खनन (Mining): खदानों (जैसे दक्षिण अफ्रीका की सोने की खदानें जो 3-4 किमी गहरी हैं) से निकलने वाली चट्टानों से हमें ऊपरी परतों के पदार्थों की जानकारी मिलती है।
- प्रवेधन परियोजनाएं (Drilling Projects): 'डीप ओशन ड्रिलिंग प्रोजेक्ट' (Deep Ocean Drilling Project) और 'इंटीग्रेटेड ओशन ड्रिलिंग प्रोजेक्ट' के तहत महासागरों में कई किलोमीटर गहरे छेद करके चट्टानों के नमूने निकाले गए हैं।
- ज्वालामुखी उद्गार (Volcanic Eruption): यह सबसे प्रामाणिक प्रत्यक्ष स्रोत है। जब ज्वालामुखी फटता है तो पृथ्वी की गहराई से पिघला हुआ मैग्मा (लावा) बाहर आता है, जिसका प्रयोगशाला में परीक्षण करके पृथ्वी के अंदर के पदार्थों की रासायनिक संरचना का पता लगाया जाता है।
(B) अप्रत्यक्ष स्रोत (Indirect Sources)
चूँकि हम अत्यधिक गहराई तक नहीं जा सकते, इसलिए वैज्ञानिकों ने वैज्ञानिक गणनाओं और भौतिक प्रभावों का सहारा लिया:
- तापमान, दबाव और घनत्व: गहराई बढ़ने के साथ-साथ पृथ्वी का तापमान प्रति 32 मीटर पर लगभग 1°C बढ़ जाता है। साथ ही दबाव और चट्टानों का घनत्व (Density) भी बढ़ता है।
- उल्कापिंड (Meteorites): अंतरिक्ष से जो उल्कापिंड पृथ्वी पर गिरते हैं, वे भी उसी पदार्थ से बने होते हैं जिससे पृथ्वी बनी है। उनका अध्ययन करके पृथ्वी की संरचना के बारे में अंदाजा लगाया जाता है।
- गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force): पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में गुरुत्वाकर्षण बल अलग-अलग होता है। ध्रुवों पर यह अधिक और भूमध्य रेखा पर कम होता है। पदार्थों के द्रव्यमान के अनुसार गुरुत्वाकर्षण में आने वाले इस अंतर को गुरुत्व विसंगति (Gravity Anomaly) कहते हैं।
- चुंबकीय सर्वेक्षण (Magnetic Surveys): इससे पृथ्वी की सतह के नीचे चुंबकीय पदार्थों (लोहा, निकेल) के वितरण का पता चलता है।
- भूकंपीय गतिविधियाँ (Seismic Activities): यह पृथ्वी की आंतरिक संरचना जानने का सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष स्रोत है।
3. भूकंप (Earthquake) और भूकंपीय तरंगें
साधारण भाषा में, पृथ्वी का कांपना या हिलना ही भूकंप कहलाता है। यह पृथ्वी के अंदर से ऊर्जा के अचानक निकलने के कारण होता है।
भूकंप से जुड़े महत्वपूर्ण शब्द:
- उद्गम केंद्र / फोकस (Focus / Hypocenter): पृथ्वी के अंदर का वह बिंदु जहाँ से ऊर्जा निकलती है और भूकंप की शुरुआत होती है।
- अधिकेंद्र (Epicenter): पृथ्वी की सतह (धरातल) पर वह बिंदु जो उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90 डिग्री के कोण पर) होता है। भूकंपीय तरंगें सबसे पहले यहीं पहुँचती हैं और सबसे ज्यादा तबाही भी यहीं मचती है।
भूकंपीय तरंगों के प्रकार (Types of Seismic Waves)
भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) पर मुख्य रूप से दो प्रकार की तरंगें दर्ज की जाती हैं: भू-गर्भिक तरंगें (Body Waves) और धरातलीय तरंगें (Surface Waves)। भू-गर्भिक तरंगें भी दो प्रकार की होती हैं:
| तरंग का प्रकार | गति एवं माध्यम | विशेषता एवं स्वभाव |
|---|---|---|
| P-तरंगें (Primary Waves - प्राथमिक तरंगें) | सबसे तेज गति (ठोस, द्रव और गैस तीनों माध्यमों में) | यह ध्वनि तरंगों (Sound Waves) के समान होती है और सिस्मोग्राफ पर सबसे पहले पहुँचती है। |
| S-तरंगें (Secondary Waves - द्वितीयक तरंगें) | मध्यम गति (केवल ठोस माध्यम में) | यह प्रकाश तरंगों (Light Waves) के समान चलती है और तरल (Liquid) में प्रवेश करते ही लुप्त हो जाती है। |
| L-तरंगें (Surface Waves - धरातलीय तरंगें) | सबसे धीमी गति (केवल धरातल के साथ) | यह सबसे अंत में पहुँचती है और सबसे अधिक विनाशकारी (Destructive) होती है। इमारतों को यही गिराती है। |
भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)
भूकंपीय तरंगें पृथ्वी के अंदर अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरते समय मुड़ जाती हैं (Refraction)। सिस्मोग्राफ पर कुछ ऐसे क्षेत्र होते हैं जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग रिकॉर्ड नहीं होती। इसे छाया क्षेत्र (Shadow Zone) कहते हैं।
- P-तरंग का छाया क्षेत्र: भूकंप के अधिकेंद्र से 105° से 145° के बीच P-तरंगें दर्ज नहीं होतीं।
- S-तरंग का छाया क्षेत्र: 105° के बाद S-तरंगें बिल्कुल दिखाई नहीं देतीं क्योंकि वे द्रव अवस्था वाले क्रोड में प्रवेश नहीं कर पातीं। S-तरंग का छाया क्षेत्र बहुत बड़ा होता है (लगभग पृथ्वी का 40% हिस्सा)।
भूकंप का मापन (Measurement of Earthquake)
- रिक्टर स्केल (Richter Scale):** यह भूकंप की **तीव्रता (Magnitude)** मापता है (0 से 10)। यह भूकंप के दौरान मुक्त हुई ऊर्जा का परिमाण बताता है।
4. पृथ्वी की आंतरिक परतें (Layered Structure of the Earth)
भूकंपीय तरंगों की गति के आधार पर पृथ्वी को तीन मुख्य परतों में बाँटा गया है:
1. भूपर्पटी (Crust - क्रस्ट)
यह पृथ्वी की सबसे बाहरी, ठोस और सबसे पतली परत है। इसकी औसत मोटाई महासागरों के नीचे 5 किमी और महाद्वीपों के नीचे 30 से 70 किमी (पहाड़ों के नीचे सबसे मोटी) होती है।
- महाद्वीपीय क्रस्ट भारी खनिजों (सिलिका और एल्युमीनियम) से बनी है, जिसे सियाल (SIAL) कहते हैं।
- महासागरीय क्रस्ट भारी चट्टानों (बेसाल्ट) से बनी है जिसमें सिलिका और मैग्नीशियम अधिक होता है, इसे सिमा (SIMA) कहते हैं।
2. मेंटल (Mantle)
भूपर्पटी के ठीक नीचे की परत मेंटल कहलाती है। इसकी मोटाई 2,900 किलोमीटर तक है।
- इसके ऊपरी हिस्से को दुर्बलता मंडल (Asthenosphere) कहते हैं, जो लगभग 400 किमी तक गहरा है।
- ज्वालामुखी विस्फोट: जब ज्वालामुखी फटता है, तो जो लावा बाहर आता है, उसका मुख्य स्रोत यही 'एस्थेनोस्फीयर' है क्योंकि यह अर्ध-पिघली (Semi-liquid) अवस्था में होता है।
- स्थलमंडल (Lithosphere): भूपर्पटी (Crust) और मेंटल का सबसे ऊपरी ठोस भाग मिलकर 'स्थलमंडल' बनाते हैं (मोटाई 10 से 200 किमी)।
3. क्रोड (Core)
यह पृथ्वी का सबसे भीतरी भाग है, जो 2,900 किमी से शुरू होकर पृथ्वी के केंद्र (6,371 किमी) तक फैला है।
- इसे निफे (NIFE) भी कहते हैं क्योंकि यह निकेल (Nickel) और लोहे (Ferrum) जैसे भारी खनिजों से बना है।
- बाहरी क्रोड (Outer Core): तरल (Liquid) अवस्था में है।
- आंतरिक क्रोड (Inner Core):** अत्यधिक दबाव (Pressure) के कारण ठोस (Solid) अवस्था में है।
5. ज्वालामुखी और ज्वालामुखीय आकृतियाँ (Volcanoes & Landforms)
ज्वालामुखी पृथ्वी की सतह पर वह दरार या छिद्र है जिससे होकर पृथ्वी के अंदर का पिघला हुआ मैग्मा, गैसें, राख और जलवाष्प भयंकर विस्फोट के साथ बाहर आते हैं।
ज्वालामुखी के प्रमुख प्रकार:
- शील्ड ज्वालामुखी (Shield Volcanoes): ये ज्वालामुखी बहुत विशाल होते हैं लेकिन इनकी ढलान कम होती है। ये मुख्य रूप से बेसाल्ट लावे से बनते हैं जो बहुत पतला होता है। (उदाहरण: हवाई द्वीप के ज्वालामुखी)।
- मिश्रित ज्वालामुखी (Composite Volcanoes): इनका लावा गाढ़ा और चिपचिपा होता है। इनमें भयंकर विस्फोट होता है और लावे के साथ भारी मात्रा में राख बाहर निकलकर परतों के रूप में जम जाती है।
- ज्वालामुखी कुंड (Caldera): ये पृथ्वी के सबसे अधिक विस्फोटक ज्वालामुखी होते हैं। जब इनमें विस्फोट होता है तो ये ऊँचा पहाड़ बनाने के बजाय खुद अपने ही अंदर धंस जाते हैं और एक बड़ा गड्ढा बन जाता है, जिसे काल्डेरा कहते हैं।
- बेसाल्ट प्रवाह क्षेत्र (Flood Basalt Provinces): इनमें लावा फव्वारे की तरह निकलता है और सैकड़ों किलोमीटर तक फैल जाता है। भारत का दक्कन का पठार (Deccan Trap) इसी तरह बना है।
- मध्य-महासागरीय कटक ज्वालामुखी: ये समुद्र के अंदर पाए जाते हैं और इनकी श्रृंखला 70,000 किमी से भी अधिक लंबी होती है।
अंतर्वेधी आकृतियाँ (Intrusive Volcanic Landforms)
जब ज्वालामुखी का मैग्मा धरातल के ऊपर न पहुँचकर पृथ्वी की पपड़ी (Crust) के अंदर ही ठंडा होकर जम जाता है, तो कई प्रकार की अंतर्वेधी आकृतियाँ बनती हैं:
- बैथोलिथ (Batholith): मैग्मा का बहुत बड़ा पिंड जो गहराई में ठंडा होकर गुंबद (Dome) के आकार में जम जाता है। यह ग्रेनाइट चट्टानों का बना होता है।
- लैकोलिथ (Laccolith):** यह भी गुंबद के आकार की अंतर्वेधी चट्टान होती है, लेकिन इसका निचला हिस्सा समतल होता है और यह एक नली (Pipe) द्वारा नीचे मैग्मा से जुड़ा होता है।
❓ बिहार बोर्ड परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (VVI Questions & Answers)
- भूपर्पटी (Crust): यह सबसे बाहरी ठोस परत है जो महाद्वीपों और महासागरों के नीचे फैली है। इसमें P और S दोनों तरंगें आसानी से चलती हैं।
- मेंटल (Mantle):** 2,900 किमी गहराई तक फैली परत। यहाँ चट्टानों का घनत्व अधिक होने के कारण तरंगों की गति बढ़ जाती है। इसका ऊपरी हिस्सा (दुर्बलता मंडल) अर्ध-पिघला है।
- बैथोलिथ: गहराई में बना मैग्मा का विशालकाय गुंबद।
- लैकोलिथ: छतरी के आकार की अंतर्वेधी चट्टान जो नीचे एक नली से जुड़ी होती है।
- लैपोलिथ: तश्तरी (Saucer) के आकार में जमा मैग्मा।
- फैकोलिथ: मोड़दार पहाड़ों की तरंगदार आकृतियों में जमा मैग्मा।
- सिल: क्षैतिज रूप में फैली चादर की तरह जमा लावा।
- डाइक: दीवारों या खंभों की तरह लंबवत दरारों में जमा लावा।
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