1. परिचय एवं अधिशोषण (Introduction & Adsorption)
रसायन विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत पदार्थों की सतह या पृष्ठ (Surface / Interface) पर होने वाली परिघटनाओं का अध्ययन किया जाता है, उसे पृष्ठ रसायन (Surface Chemistry) कहते हैं।
अधिशोषण (Adsorption):
किसी ठोस या द्रव की सतह पर किसी गैस या द्रव के अणुओं का आकर्षित होकर संचित (Accumulate) होने की प्रक्रिया को **अधिशोषण** कहते हैं।
- अधिशोषक (Adsorbent): वह पदार्थ जिसकी सतह पर अधिशोषण होता है (उदा. चारकोल, सिलिका जेल, निकेल)।
- अधिशोष्य (Adsorbate): वह पदार्थ जो सतह पर जाकर एकत्रित होता है (उदा. O2, NH3, H2 गैस)।
- विशोषण (Desorption): अधिशोषित पदार्थ का सतह से हटना विशोषण कहलाता है।
अधिशोषण और अवशोषण में अंतर (Adsorption vs Absorption):
| गुण | अधिशोषण (Adsorption) | अवशोषण (Absorption) |
|---|---|---|
| प्रकृति | यह एक **पृष्ठीय परिघटना** (Surface Phenomenon) है। | यह एक **बल्क परिघटना** (Bulk Phenomenon) है। |
| सांद्रता | पदार्थ की सांद्रता केवल सतह पर अधिक होती है। | पदार्थ संपूर्ण निकाय में समान रूप से वितरित होता है। |
| दर | प्रारंभ में तीव्र तथा साम्यावस्था पर मंद हो जाती है। | यह समान दर से पूरी प्रक्रिया में चलती है। |
| उदाहरण | सिलिका जेल द्वारा जलवाष्प का अधिशोषण। | निर्जल CaCl2 द्वारा जलवाष्प का अवशोषण। |
शोषण (Sorption): जब अधिशोषण और अवशोषण दोनों क्रियाएँ एक साथ होती हैं, तो उसे 'शोषण' कहते हैं।
2. अधिशोषण के प्रकार (Types of Adsorption)
अधिशोषक और अधिशोष्य के बीच बलों की प्रकृति के आधार पर अधिशोषण दो प्रकार का होता है:
1. भौतिक अधिशोषण (Physical Adsorption / Physisorption):
जब अधिशोष्य के अणु अधिशोषक की सतह से दुर्बल **वांडर वाल्स बलों (Van der Waals Forces)** द्वारा जुड़े होते हैं।
2. रासायनिक अधिशोषण (Chemical Adsorption / Chemisorption):
जब अधिशोष्य के अणु अधिशोषक की सतह से प्रबल **रासायनिक बंधों (Covalent / Ionic Bonds)** द्वारा जुड़े होते हैं।
| गुण | भौतिक अधिशोषण | रासायनिक अधिशोषण |
|---|---|---|
| आकर्षण बल | दुर्बल वांडर वाल्स बल। | प्रबल रासायनिक बंध। |
| विशिष्टता | यह विशिष्ट नहीं होता (अविशिष्ट)। | यह अत्यधिक विशिष्ट होता है। |
| उत्क्रमणीयता | उत्क्रमणीय (Reversible) होता है। | अनुत्क्रमणीय (Irreversible) होता है। |
| अधिशोषण ऊष्मा | कम होती है (20-40 kJ/mol)। | अधिक होती है (80-240 kJ/mol)। |
| परत (Layer) | बहु-आणविक (Multimolecular) परत बनती है। | एकल-आणविक (Unimolecular) परत बनती है। |
| ताप का प्रभाव | ताप बढ़ाने पर घटता है। | प्रारंभ में ताप बढ़ाने पर बढ़ता है, फिर घटता है। |
अधिशोषण समतापी (Adsorption Isotherm):
स्थिर ताप पर अधिशोषित गैस की मात्रा (x/m) और दाब (P) के बीच खींचे गए वक्र को **अधिशोषण समतापी** कहते हैं।
फ्रेंडलिच अधिशोषण समतापी (Freundlich Adsorption Isotherm):
x / m = k · P1/n (जहाँ n > 1)
लघुगणकीय रूप लेने पर:
log (x / m) = log k + (1/n) log P
3. उत्प्रेरण (Catalysis)
वे बाहरी पदार्थ जो बिना स्वयं परिवर्तित हुए किसी रासायनिक अभिक्रिया के वेग को बदल देते हैं, उन्हें **उत्प्रेरक (Catalyst)** कहते हैं तथा इस घटना को **उत्प्रेरण** कहते हैं।
उत्प्रेरण के प्रकार (अवस्था के आधार पर):
- समांगी उत्प्रेरण (Homogeneous Catalysis): जब अभिकारक, उत्पाद और उत्प्रेरक सभी एक ही भौतिक अवस्था (प्रावस्था) में हों।
2SO2(g) + O2(g) --[NO(g)]--> 2SO3(g) - विषमांगी उत्प्रेरण (Heterogeneous Catalysis): जब अभिकारक और उत्प्रेरक भिन्न-भिन्न भौतिक अवस्थाओं में हों।
N2(g) + 3H2(g) --[Fe(s)]--> 2NH3(g) (हैबर विधि)
एंजाइम उत्प्रेरण (Enzyme Catalysis):
एंजाइम जटिल नाइट्रोजनयुक्त कार्बनिक यौगिक हैं जिन्हें **"जैव उत्प्रेरक" (Biological Catalysts)** कहा जाता है। ये जीवित कोशिकाओं में बनते हैं।
- इन्वर्टेज: सुक्रोज → ग्लूकोज + फ्रक्टोज
- जाइमेज: ग्लूकोज → एथिल अल्कोहल + CO2
- यूरिएज: यूरिया → अमोनिया + CO2
ताला-चाबी सिद्धांत (Lock & Key Mechanism): एंजाइम की क्रियाविधि ताला-चाबी मॉडल पर आधारित होती है, जिसमें एक विशिष्ट एंजाइम केवल एक विशिष्ट क्रियाधार (Substrate) पर ही कार्य करता है।
4. कोलाइडल अवस्था (Colloidal State)
कणों के आकार के आधार पर विलयन तीन प्रकार के होते हैं:
- वास्तविक विलयन (True Solution): कणों का आकार < 1 nm (10-9 m)। (उदा. जल में नमक)
- कोलाइडल विलयन (Colloidal Solution): कणों का आकार 1 nm से 1000 nm (10-9 m से 10-6 m) के बीच। (उदा. दूध, गोंद, रक्त)
- निलंबन (Suspension): कणों का आकार > 1000 nm। (उदा. जल में मिट्टी)
कोलाइडल निकाय के घटक:
- परिक्षेपित प्रावस्था (Dispersed Phase): वह घटक जो कम मात्रा में होता है (विलेय के समान)।
- परिक्षेपण माध्यम (Dispersion Medium): वह घटक जिसमें कण फैले रहते हैं (विलायक के समान)।
इंटरेक्शन के आधार पर कोलाइड का वर्गीकरण:
| गुण | द्रवरागी / द्रव-स्नेही (Lyophilic) | द्रवविरागी / द्रव-विरोधी (Lyophobic) |
|---|---|---|
| आकर्षण | परिक्षेपित प्रावस्था तथा माध्यम में तीव्र आकर्षण। | दोनों घटकों में कोई आकर्षण नहीं। |
| बनाने की विधि | केवल मिलाने पर आसानी से बन जाते हैं। | विशेष/अप्रत्यक्ष विधियों से बनाए जाते हैं। |
| स्थायित्व | अधिक स्थायी होते हैं। | कम स्थायी (अस्थायी) होते हैं। |
| उत्क्रमणीयता | उत्क्रमणीय (Reversible) सोल। | अनुत्क्रमणीय (Irreversible) सोल। |
| उदाहरण | गोंद, स्टार्च, जिलेटिन, प्रोटीन। | धातुओं के सोल (जैसे Gold Sol, As2S3 Sol)। |
5. कोलाइडल विलयन बनाने एवं शोधन की विधियां
1. बनाने की विधियां:
- पेप्टीकरण (Peptization): ताजे बने अवक्षेप में कोई उपयुक्त वैद्युत अपघट्य (Peptizing agent) मिलाकर उसे कोलाइडल विलयन में बदलने की प्रक्रिया पेप्टीकरण कहलाती है।
- ब्रेडिग की आर्क विधि (Bredig's Arc Method): इसका उपयोग सोने (Gold), चांदी (Silver), प्लेटिनम आदि के धात्विक सोल बनाने में होता है। इसमें विद्युत आर्क और संघनन दोनों प्रक्रियाएं शामिल हैं।
2. शोधन की विधियां (Purification):
- अपोहन (Dialysis): चर्मपत्र (Parchment Paper) या पारगम्य झिल्ली द्वारा अशुद्धियों (क्रिस्टलाभ) को बहाकर कोलाइड को शुद्ध करने की प्रक्रिया।
- विद्युत अपोहन (Electrodialysis): अपोहन प्रक्रिया को तेज करने के लिए विद्युत क्षेत्र का उपयोग किया जाता है।
6. कोलाइडल विलयन के गुणधर्म (Properties of Colloids)
1. प्रकाशिक गुण - टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect):
जब किसी प्रकाश पुंज को कोलाइडल विलयन से गुजारा जाता है, तो कोलाइडल कण प्रकाश का **प्रकीर्णन (Scattering of Light)** कर देते हैं, जिससे प्रकाश का मार्ग चमकीला दिखाई देने लगता है। इसे टिंडल प्रभाव कहते हैं।
2. गतिक गुण - ब्राउनी गति (Brownian Movement):
सूक्ष्मदर्शी से देखने पर कोलाइडल कणों की परिक्षेपण माध्यम में होने वाली **अविरत टेढ़ी-मेढ़ी (Zig-zag) गति** को ब्राउनी गति कहते हैं। यह कोलाइड को स्थायित्व प्रदान करती है।
3. वैद्युत गुण - वैद्युत कण संचालन (Electrophoresis):
विद्युत क्षेत्र के प्रभाव में कोलाइडल कणों का विपरीत आवेश वाले इलेक्ट्रोड की ओर गमन करना **वैद्युत कण संचालन** कहलाता है। इससे कोलाइडल कणों पर आवेश की उपस्थिति सिद्ध होती है।
4. स्कंदन या ऊर्णन (Coagulation / Flocculation):
कोलाइडल कणों का अपना आवेश खोकर आपस में जुड़कर बड़े कण के रूप में अवक्षेपित (Precipitate) होना **स्कंदन** कहलाता है।
हार्ड-शुलझे का नियम (Hardy-Schulze Law):
1. किसी कोलाइडल विलयन के स्कंदन के लिए मिलाए गए आयन का आवेश कोलाइडल कण के आवेश के विपरीत होना चाहिए।
2. स्कंदक आयन की **संयोजकता (Valency)** जितनी अधिक होगी, उसकी स्कंदन क्षमता (Coagulating Power) उतनी ही अधिक होगी।
धनात्मक सोल के लिए स्कंदन क्षमता का क्रम: [Fe(CN)6]4- > PO43- > SO42- > Cl-
ऋणात्मक सोल के लिए स्कंदन क्षमता का क्रम: Al3+ > Mg2+ > Na+
स्वर्ण संख्या (Gold Number):
द्रवरागी कोलाइडों की **रक्षी क्षमता (Protective Action)** को मापने के लिए जिगमोंडी ने स्वर्ण संख्या का प्रतिपादन किया। स्वर्ण संख्या का मान जितना कम होगा, उसकी रक्षी क्षमता उतनी ही अधिक होगी।
7. पायस (Emulsion)
वह कोलाइडल निकाय जिसमें परिक्षेपित प्रावस्था और परिक्षेपण माध्यम दोनों ही **द्रव (Liquid)** होते हैं, उसे **पायस** कहते हैं।
पायस के प्रकार:
- जल में तेल (O/W Type): जल माध्यम है और तेल सूक्ष्म बूंदों के रूप में फैला है। (उदा. दूध, वैनिशिंग क्रीम)
- तेल में जल (W/O Type): तेल माध्यम है और जल की बूंदे फैली हैं। (उदा. मक्खन, कोड-लिवर ऑयल, कोल्ड क्रीम)
पायसीकारक (Emulsifier): पायस को स्थायित्व देने वाले पदार्थ को पायसीकारक कहते हैं (उदा. दूध में केसीन प्रोटीन)।
8. बिहार बोर्ड परीक्षा - अति महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (BSEB VVI Questions)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (Objective Questions)
- दूध किस प्रकार का कोलाइडल तंत्र है?
उत्तर: जल में तेल प्रकार का पायस (O/W Emulsion) - कोलाइडल कणों की टेढ़ी-मेढ़ी गति को क्या कहते हैं?
उत्तर: ब्राउनी गति (Brownian Movement) - स्वर्ण संख्या (Gold Number) किसकी रक्षी क्षमता को प्रदर्शित करती है?
उत्तर: द्रवरागी कोलाइड (Lyophilic Colloid) - रक्त किस प्रकार का कोलाइडल विलयन है?
उत्तर: ऋणावेशित कोलाइड (Negative Sol) - ताजे अवक्षेप को कोलाइडल विलयन में बदलने की प्रक्रिया क्या कहलाती है?
उत्तर: पेप्टीकरण (Peptization)
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
प्रश्न 1: भौतिक अधिशोषण और रासायनिक अधिशोषण में दो मुख्य अंतर लिखें।
उत्तर:
- भौतिक अधिशोषण: इसमें दुर्बल वांडर वाल्स बल होते हैं, यह उत्क्रमणीय होता है और इसमें कम ऊष्मा निकलती है।
- रासायनिक अधिशोषण: इसमें प्रबल रासायनिक बंध बनते हैं, यह अनुत्क्रमणीय होता है और इसमें अधिक ऊष्मा निकलती है।
प्रश्न 2: टिंडल प्रभाव क्या है?
उत्तर: जब प्रकाश की किरण किसी कोलाइडल विलयन से गुजरती है, तो कोलाइडल कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण प्रकाश का मार्ग दिखाई देने लगता है। इस परिघटना को टिंडल प्रभाव कहते हैं।
प्रश्न 3: हार्ड-शुलझे का नियम क्या है?
उत्तर: इस नियम के अनुसार, किसी विपरीत आवेश वाले आयन की संयोजकता जितनी अधिक होगी, उसकी कोलाइडल विलयन को स्कंदित (अवक्षेपित) करने की क्षमता उतनी ही अधिक होगी। (जैसे- Al3+ की स्कंदन क्षमता Mg2+ से अधिक है)।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
प्रश्न: कोलाइडल विलयन क्या हैं? द्रवरागी (Lyophilic) तथा द्रवविरागी (Lyophobic) कोलाइडों में विस्तृत अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर:
कोलाइडल विलयन: वह विषमांगी मिश्रण जिसमें परिक्षेपित कणों का आकार 1 nm से 1000 nm के मध्य होता है, उसे कोलाइडल विलयन कहते हैं।
द्रवरागी एवं द्रवविरागी कोलाइडों में अंतर:
- आकर्षण बल: द्रवरागी में परिक्षेपित प्रावस्था तथा माध्यम के बीच तीव्र आकर्षण होता है, जबकि द्रवविरागी में आकर्षण नहीं होता।
- बनाने की सुगमता: द्रवरागी को केवल माध्यम के साथ हिलाने या गर्म करने पर बनाया जा सकता है, जबकि द्रवविरागी को बनाने के लिए विशेष रासायनिक या भौतिक विधियों (जैसे पेप्टीकरण) की आवश्यकता होती है।
- स्थायित्व: द्रवरागी कोलाइड अत्यधिक स्थायी होते हैं और इनमें विद्युत अपघट्य मिलाने पर आसानी से अवक्षेपित नहीं होते। इसके विपरीत द्रवविरागी कोलाइड कम स्थायी होते हैं और थोड़ा-सा विद्युत अपघट्य मिलाने पर स्कंदित हो जाते हैं।
- उत्क्रमणीयता: द्रवरागी कोलाइड उत्क्रमणीय होते हैं (वाष्पीकरण के बाद पुनः विलायक मिलाने पर कोलाइड बन जाता है), जबकि द्रवविरागी अनुत्क्रमणीय होते हैं।
- उदाहरणात्मक अंतर: गोंद, जिलेटिन, स्टार्च द्रवरागी कोलाइड के उदाहरण हैं, जबकि गोल्ड सोल, आर्सेनिक सल्फाइड सोल आदि द्रवविरागी कोलाइड के उदाहरण हैं।
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